تاریخ : ۱۳ آبان ۱۳۹۶
میل و ملال
روایتگر: محسن محمد
در ابتدای جلسه با اشاره بر بیت 356 (او همی گوید عجب این قبض چیست؟ قبض آن مظلوم کز شَرَّت گریست) از جلسه ی قبل، به این بحث میپردازیم که چه اتفاقی موجب تفاوت در نتایج اعمال به ظاهر مشابه میشود
ورود به بحث میل و ملال به واسطه ی شروع دوباره ی قصه ی اهل سبا
| ۳۶۴ | آن سَبا زَاهْلِ صِبا بودند و خام | کارَشان کُفرانِ نِعْمَت با کِرام | |
| ۳۶۵ | باشد آن کُفرانِ نِعْمَت در مِثال | که کُنی با مُحسنِ خود تو جِدال | |
| ۳۶۶ | که نمیباید مَرا این نیکُوی | من به رَنجَم زین، چه رَنْجَم میشوی؟ | |
| ۳۶۷ | لُطْف کُن این نیکُوی را دور کُن | من نخواهم چَشم، زودَم کور کُن | |
| ۳۶۸ | پس سَبا گُفتند باعِدْ بَیْنَنا | شَیْنُنا خَیْرٌ لَنا خُذْ زَیْنَنا | |
| ۳۶۹ | ما نمیخواهیم این ایوان و باغ | نه زَنانِ خوب و نه اَمْن و فَراغ | |
| ۳۷۰ | شهرها نزدیکِ هَمدیگر بَد است | آن بیابان است خوش، کانجا دَد است | |
| ۳۷۱ | یَطْلُبُ الاِنْسانُ فِی الصَّیْفِ الشِّتا | فَاِذا جاءَ الشِّتا اَنْکَرَ ذا | |
| ۳۷۲ | فَهْوَ لا یَرْضی بِحالٍ اَبَدا | لا بِضیقٍ لا بِعَیْشٍ رَغَدا | |
| ۳۷۳ | قُتِلَ الاِنْسانُ ما اَکْفَرَهُ | کُلَّما نالَ هُدًی اَنْکًرَهُ | |
| ۳۷۴ | نَفْس زینسان است، زان شُد کُشتنی | اُقْتُلوا اَنْفُسَکُمْ گفت آن سَنی | |
| ۳۷۵ | خارِ سهسوی است هر چون کِشْ نَهی | دَرخَلَد، وَزْ زَخْمِ او تو کِی جَهی؟ | |
| ۳۷۶ | آتشِ تَرکِ هَوا در خارْ زَن | دست اَنْدَر یارِ نیکوکار زن | |
| ۳۷۷ | چون زِ حَد بُردند اَصْحابِ سَبا | که به پیشِ ما وَبا بِهْ از صَبا | |
| ۳۷۸ | ناصِحانْشان در نَصیحَت آمدند | از فُسوق و کُفر مانِع میشُدند | |
| ۳۷۹ | قَصدِ خونِ ناصِحان میداشتند | تُخمِ فِسْق و کافِری میکاشتند | |
| ۳۸۰ | چون قَضا آید شود تَنگْ این جهان | از قَضا حَلْوا شود رَنجِ دَهان | |
| ۳۸۱ | گفت اذا جاءَ الْقَضا ضاقَ الْفَضا | تُحْجَبُ الْاَبْصارُ اِذْ جاءَ الْقَضا | |
| ۳۸۲ | چَشمْ بسته میشود وَقتِ قَضا | تا نَبینَد چَشمْ کُحْلِ چَشم را | |
| ۳۸۳ | مَکرِ آن فارِس چو اَنْگیزید گَرد | آن غُبارَت زِاسْتِغاثَت دور کرد | |
| ۳۸۴ | سویِ فارِس رو، مَرو سویِ غُبار | وَرْنه بر تو کوبَد آن مَکْرِ سوار | |
| ۳۸۵ | گفت حَق آن را کِه این گُرگَش بِخَورْد | دید گَردِ گُرگ، چون زاری نکرد؟ | |
| ۳۸۶ | او نمیدانست گَردِ گُرگ را؟ | با چُنین دانشْ چرا کرد او چَرا؟ | |
| ۳۸۷ | گوسفندان بویِ گُرگِ با گَزَند | میبِدانَند و به هر سو میخَزَند | |
| ۳۸۸ | مَغزِ حیواناتْ بویِ شیر را | میبِدانَد، تَرک میگوید چَرا | |
| ۳۸۹ | بویِ شیرِ خَشمْ دیدی، بازگَرد | با مُناجات و حَذَر اَنْباز گَرد | |
| ۳۹۰ | وانَگَشتَند آن گُروه از گَردِ گُرگ | گُرگِ مِحْنَت بَعدِ گَرد آمد سُتُرگ | |
| ۳۹۱ | بَردَرید آن گوسفندان را به خشم | که زِ چوپانِ خِرَد بَسْتَند چَشم | |
| ۳۹۲ | چند چوپانْشان بِخوانْد و نامَدَند | خاکِ غَم در چَشمِ چوپان میزَدَند | |
| ۳۹۳ | که بُرو، ما از تو خود چوپانتَریم | چون تَبَع گردیم؟ هر یک سَروَریم | |
| ۳۹۴ | طُعْمهٔ گُرگیم و آنِ یارْ نه | هیزُمِ ناریم و آنِ عار نه | |
| ۳۹۵ | حَمْیَتی بُد جاهِلیَّت در دِماغ | بانگِ شومی بر دِمَنْشان کرد زاغ |
